Friday, March 5, 2010


पंख होते तो
मस्ती

बालेश्वर मंदिर

जंगल में मंगल

हर फिक्र को धुंए में उडाता चला गया


वाणासुर किला चम्पावत

Thursday, March 4, 2010

जाने कहाँ गए वो दिन
कहते थे तेरी राह में
नजरों को हम झुकायेंगे
चाहे कहीं भी तुम रहो
तुमको न भूल पाएंगे
अपनी नजर में आजकल
दिन भी अँधेरी रात है
साया ही अपने साथ था
साया ही अपने साथ है

Wednesday, March 3, 2010


जब हमने तुम्हे याद किया है
दिल रोया है मेरा यार
क्यों फिर ये दीवार खड़ी है
जब करते हैं तुमको प्यार
हमने तुमको साथी माना
हमको मिली है सिर्फ जुदाई
महफ़िल में तेरी आकर भी
अपनी किस्मत में तन्हाई

Monday, January 11, 2010

पहाड़ियों पर अब नहीं गूंजते रेडियो के स्वर

एक जमाना था जब हमारी भोर सुबह सवेरे रेडियो पर बजती प्रारंभिक प्रसारण धुन को सुनकर होती थी इसके बाद रेडियो पर बजता वन्दे मातरम का स्वर कानों को एक अलग ही आनंद प्रदान करता था उसके बाद एक के बाद एक हरिओम सरीखे अन्य लोगों की मधुर वाणी में भजनों का सिलसिला फिर समाचार यह आकाशवाणी है अब आप राजेंद्र चुध से समाचार सुनिए या फिर इयं आकाशवाणी सम्प्रति वार्ताः श्रोयांताम प्रवाचकः बलदेव नन्द सागरः इसके अलावा बिनाका संगीत माला, सुर सरिता, पुराने तराने, छायागीत, त्रिवेणी, बुजुर्गों की चोपाल, महिलाओं का घर संसार, रेडियो नाट्य रूपांतरण, आपकी फरमाइश और न जाने क्या-क्या कभी लोगों की सम्पन्नता का प्रतीक माने जाने वाले रडियो की मधुर धुनें आधुनिक उपकरणों के सामने न जाने कहाँ गुम हो गई उस दोरमें रेडियो गिने चुने लोगों के पास ही हुवा करता था मुझे याद है की उस समय गाँव में केवल हमारे पास ही रडियो हुवा करता था और लोग शाम को हमारे घर में रेडियो सुनने आया करते थे दिन में उसमे कमेंट्री सुनने वाले बड़े भ्राताओं का कब्ज़ा रहता था और शाम को हम सब चाव से एक आवाज सुनते थे कि अब हम न्याय करेंगें न्याय करने वाले कोई मूर्खाधिराज हुवा करते थे कौन थे वो नहीं मालूम लेकिन वो दिन आज भी भूले नहीं भूलते आज मनोरंजन भले ही हो रहा हो किन्तु अब पहले सा स्वस्थ नहीं रहा अब पहले की तरह एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी पर रेडियो की स्वर लहरियां भले ही न सुने देती हों किन्तु आज भी रेडियो के दीवानों की कमी नहीं आजभी दूर कहीं गूंजती रेडियो की प्राम्भिक धुन हमें अपने बचपन की और ले जाती है जब परिवार के बुजुर्ग ही रेडियो ओन किया करते थे और हम ध्यान से कान लगाये रहते थे आज भी पहाड़ के कई घरों में रेडियो का सम्मान बरक़रार है हो भी क्यों न रेडियो से सस्ता व् स्वस्थ मनोरंजन का साधन उपलब्ध जो नहीं है आज भी गर्मियों में आँगन में चारपाई पर लेटकर गाने सुनने का आनंद ही कुछ और है आज लोग भले ही टीवी की चकाचोंध में खोये हों लेकिन आने वाले दिनों में लोग सूचना व् मनोरंजन के लिए फिर से रेडियो की और लोटेंगे आज भी जी चाहता है कि काश वो दिन फिर से लौट आते कभी-कभी मेरे दिल ख्याल आता है कि तेरे जैसा यार कहाँ कहाँ ऐसा याराना यद् करेगी दुनिया तेरा मेरा अफसाना............
करन उप्रेती

Thursday, January 7, 2010

आसूं

आसूं क्यों छलके हैं आज,
क्यों टूटा है दिल का साज
कहाँ खो गए मीत वो सारे,
जो चलते थे मेरे साथ
क्यों कोई अब गीत न गाता ,
पास कोई क्यों मीत न आता
क्यों लब अपने सूखे हैं अब ,
क्यों हमको कोई समां न भाता
कहाँ खो गई बसंत बयार ,
तोता मैना का रूठा क्यों प्यार
दर्द के मारे क्यों फिरते सब ,
रूठा क्यों अपनों का दुलार

दुनिया

दुनिया ये दिखती है जैसी ,
होती नहीं है अब जाना
चोट लगी जब दिल पे अपने ,
दर्द जहाँ का तब जाना
कौन कहाँ है साथी किसका ,
मतलब के हैं यार यहाँ
कोई किसी पर सब कुछ लुटा दे ,
ऐसा अब होता है कहाँ
तन्हाई जो बाटें किसी की ,
लोग जहाँ में कब मिलते हैं
एक दूजे से आगे बढ़ने को ,
बस धोखा देते रहते हैं
प्यार में मर मिटने की बातें ,
पुस्तक में ही मिलती है
भोर सुहानी पहले जैसी ,
ख्वाबों में ही दिखती है
दर्द बाँटना कोई न जाने ,
घाव बढ़ाना सब जाने हैं
मरहम अब न कोई लगाये ,
जख्म कुरेदा करते हैं
इन खुशियों में क्या है ऐसा ,
जो औरों को दे नहीं सकते
अपनों के तो सब होते हैं ,
क्यों गैरों के हो नहीं सकते ?
कौन बताये अब ये "करन" को ,
प्यार जहाँ का क्यों मुरझाया
हँसते गाते मासूम चेहरे पे ,
दर्द का साया क्यों है छाया
करन उप्रेती

Wednesday, January 6, 2010

नानू

मेरी दुनिया में आये थे ,
तेरा ऐसे फिर जाना क्यों ?
गले मुझको लगाकर के ,
तेरा मुझको ठुकराना क्यों ?
मुझे करके यहाँ तन्हा ,
छुपा है क्यों तू बता दे तू
कहाँ तेरी वो दुनिया है ,
मुझको उसका पता दे तू
बड़ी जालिम ये दुनिया है ,
ग़मों में मेरे हंसती है
तेरी बीती वो यादें सब ,
मुझे आकर क्यों डंसती है
ये दिल कैसा दीवाना है ,
तुम्ही को याद करता है
पता इसको न आओगे ,
मगर फरियाद करता है
तेरे बिन अब यहाँ जीना ,
मेरा मुश्किल हुआ जाता
बसा है तू जहाँ जाकर ,
मुझे भी तो बुला ले तू
दिखाने मोह कुछ दिन का ,
मेरी दुनिया में क्यों आया
खता की थी कहाँ मैंने ,
मुझे ऐसे क्यों तड़पाया
& करन उप्रेती &

Tuesday, December 15, 2009

छुपा है क्यों बता दे तू

मेरी दुनिया में जो आया था
तेरा ऐसे ये जाना क्यों ?
मुझे करके यहाँ तन्हा
बता दे तू छुपा है क्यों ?
कहाँ तेरी वो दुनिया है
मुझे भी तो बुला ले तू
बड़ी जालिम ये दुनिया है
ग़मों में मेरे हंसती है
समझ पाया न मैं अब तक
इनके तरकस की चालों को
भुला अब तक न पाया मैं
तेरे बीते ख्यालों को
जहाँ तुझको लगा अपना
वहां मुझको बुला तू
रात के २ बजे हैं और मुझे नींद नहीं आ रही करीब ९.३० से सोने की कोशिश कर रहा हूँ किंतु अचानक मेरे बेटे नानू के ख्यालों ने मेरी आखों से नींद उड़ा दी

Sunday, December 6, 2009

जिन्हें हम भूलना चाहें

वो अक्सर याद आते हैं

बुरा हो इस मुहब्बत का

वो क्यूँ कर याद आते हैं ?

Tuesday, November 24, 2009

मधु स्मृति

तुम कहती कि पी पी कर मैं
मधुशाला ही में मिट जाऊंगा
तुम क्या जानो मिटने पर भी
प्रेमी मय का कहलाऊंगा
मयखाने के हर कोने में
तब चर्चे मेरे गूजेंगे
मय के प्रेमी नाम मेरा ले
अपना प्याला चूमेंगे
फिर सारे मय प्रेमी मिलकर
मन्दिर एक बनायेंगे
मूर्ति न होगी कोई उसमे
बोतल को वहां सजायेंगे
मेरी पुस्तक मधु स्मृति के कुछ अंश
करन उप्रेती

Monday, September 14, 2009

भ्रस्ताचार

देश मे भ्रस्टाचार के खिलाफ उठ रही आवाजें जहां एक शुभ संकेत हैं वहीँ देश के उच्च पदों में आसीन लोगों की आवाज इस बात की ओर इशारा करता है कि अब पानी सर के उपर पहुँच चुका है अब आम आदमी को भी इस जंग मे शामिल होना पड़ेगा ओर इस नासूर को दूर करने के लिए भ्रस्टाचार में लिप्त लोगों के लिए फांसी के साथ ही सामाजिक बहिस्कार जैसी सजाएँ भी अमल में लानी होगी आम आदमी को इस जंग के लिए आवाज उठानी होगी भ्रस्टाचार पर रोक को देश के प्रधानमंत्रीमनमोहन सिंह की चिन्ता, प्रधान न्यायाधीश के जी बालाक्रिस्नन के सुझाव कबीले तारीफ़ हैं देश में यह समस्या वर्षों से चली आ रही है किंतु आज तक इसके खिलाफ आवाज उच्च स्तर से नहीं उठाई गई प्रधान न्यायाधीश की चिन्ता व् उनके सुझाव उनकी ईमानदारी के द्योतक हैं यदि मे चोर होऊंगा तो कभी नहीं चाहूँगा की चोरों के खिलाफ कोई कठोर कानून बने मैं हर हाल में उसका विरोध करूँगा इस लडाई में वही शामिल होगा जो ख़ुद भ्रस्टाचार से दूर हो भ्रस्टाचार की इस लडाई में मंत्रियों व् देश का अन्न खाने वाले जनप्रतिनिधियों की परीक्षा भी हो जायेगी की वो देश हित में काम करते ओर सोचते हैं वास्तव में अब समय आ गया है की भ्रस्टाचार में लिप्त अधिकारीयों की संपत्ति जब्त केर उनके खिलाफ कड़ी कारवाही की जाए मैंने ऐसे कर्मचारियों के बारे में सुना व् देखा है जिन्होंने अपनी छोटी सी नौकरी के दम पर करोड़ों की सम्पति खड़ी कर ली इनकी जाँच होनी चाहिए की जिनके पास नौकरी से पहले खाने को रोटी तक नही थी अचानक करोड़ों की सम्पति कहाँ से आ गई वर्तमान में उत्तराखंड में भ्रस्टाचार चरम पर हैं जनता के धन से अधिकारी कोठियां बना रहें हैं ओर जनता भूखी प्यासी तड़प रही है सम विकास के नाम पर आया करोड़ों रुपया अधिकारियो ने डकार लिया ओर विकास कागजों में पूरा कर दिया गया धरातल पर कहीं कुछ नही दीखता बावजूद इसके इन अधिकारीयों पर कोई करवाई न होना बताता है की धन मंत्री विधायको तक भी पहुँचता है इस जंग में न्यायपालिका के समर्थन के बाद अब जनता को खुलकर सामने आना होगा जागो इंडिया जागो वरना भूख प्यास व् असंतुलन के चलते अपने प्राण त्यागो प्रधान न्यायाधीश को कोटि कोटि सलाम ओर जंग में सामिल होने वाले सभी देश प्रेमी नागरिकों को भी प्रणाम जय हिंद

हरीश उप्रेती {करन}

चम्पावत